भारत में प्राचीन समय से ही लीडरशिप रहा है, यानी हमने अपना लीडर या नेता हरदम से चुना है।
पर बात लीडर चुनने की नहीं है, बात ये हो जाती है कि हम अपने लीडर को अपना कर्ता धर्ता या अपना भगवान मान लेते हैं। हम इतने ज्यादा उस व्यक्ति पर आश्रित/डिपेंड हो जाते हैं कि उसकी हर बात और कार्य पर बिना कुछ सोचे समझे अंधा विश्वास करने लगते हैं और उसे अपना भगवान बना लेते हैं।
प्राचीन समय से ही चली आ रही है ये गुलामियत
बात करते हैं सिंधु घाटी सभ्यता से, सिंधु घाटी सभ्यता का जिक्र इस लिये कर रहा हूं क्योंकि वही एक सभ्यता और वही एक काल है जिसका हमारे पास प्रमाण है।
पुराने तथ्यों और दस्तावेजों के अनुसार इस सभ्यता के समय से ही हम अपना राजा और अपना लीडर चुनते आ रहे हैं। जब आप प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो पता चलेगा कि उस समय कैसे राजा अपनी हुकूमत चलाया करते थे और कैसे इन लोगों ने लोगों को उनके आर्थिक और सामाजिक स्थिति के हिसाब से बांट रखा था।
राजा और उनसे संबद्ध रखने वाले लोग दुर्ग यानी ऊंचे स्थान पर बड़े घरों में रहते थे। और प्रजा नीचे रहा करती थी।यह साबित करता है उस समय भी लोग राजा को अपना भगवान और कर्ता धर्ता बनाए हुए थे, जिससे राजा और उनके साथी अपने मनमाने तरीके से राज किया करते थे और प्रजा को हर सुविधाओं से वंचित रखा जातालीडर, राजा या नेता का काम होता है सही मार्गदर्शन करना और लोगों तक सारी सुविधाएं पहुंचना, ना की खुद सुविधाओं का लाभ उठाना और जनता को हर चीज से वंचित कर देना।
लीडरशिप कैसी-कैसी रही अतीत में
हम बात कर रहे अतीत की जब हमारा लीडर हमपे इतना हावी हो गया कि उसने जाति – धर्म जैसी परंपराओं को अस्तित्व में ल दिया और जनता के ऊपर उसे थोप दिया, जिसका बोझ आज हम लेकर ढो रहें है।
हमारे नेताओं ने हमारी बदौलत खुद को इतना ऊंचा दर्जा दे दिया कि हमने उसे अपना करता धर्ता बना दिया, और उसने अपने मनमाने तरीके से खुद को हमारा भाग्य – विधाता बना लिया। इसका परिणाम ये हुआ कि उसने खुद को ऊंचा रखने के लिए हम लोगों को अलग अलग वर्गों में बांट दिया, जिससे हम आपस में ही खुद को ऊंचा – नीचा साबित करने में हजारों साल व्यर्थ कर दिये और वो ये सब वर्गीकरण करने वाला हमारा लीडर, नेता या भगवान अपनी जिंदगी के हसीन पल जी कर चला गया और हमे लड़ता हुआ छोड़ चलाहम आज भी खुद को साबित करने में अपना समय व्यर्थ करते हैं और आज भी हमारा नेता इस बात का फायदा उठाकर मलाई काट रहा है।
क्या सभी लीडर एक ही तरह की मानसिकता के थे?
कुछ महान लीडर भी आए जिन्हों खुद से ज्यादा जनता के बारे में सोचा और उनका मार्गदर्शन किया और उनके कल्याण के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
कुछ लीडर ऐसे रहे जिन्होंने महान कार्य करके अपना जीवन त्याग दिया। जैसे कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
गौतम बुद्ध – इन्होंने अपने राजशाही जीवन को त्यागकर जनता को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाया और लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
महावीर – महावीर ने भी अपना जीवन जनता के लिए समर्पित कर दिया।
ऐसे ही बहुत सारे राजा हुए जिन्होंने जनता को सर्वोपरि माना, वेद पुराणों में भी बहुत से राजाओं का जिक्र मिलता है जिसमें जनता की सेवा को इन लोगों ने अपना कर्त्तव्य माना और अपना जीवन समर्पित कर दिया।
कुछ तत्कालीन उदाहरण हैं जैसे गांधी जी जिन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया, वे भी चाहते तो अपना जीवन आराम से बिताते, इनके वकालत का फायदा इनको जिंदगी भर मिलता। पर इन्होंने देश को आजादी दिलाई और देश की जनता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
इसी तरह सुभाष चंद्र बोष, भगत सिंह, लाला लाजपत राय, रानी लक्ष्मी बाई, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, जवाहर लाल नेहरू, डॉ भीमराव आंबेडकर, आदि लोग ऐसे लीडर हुए जिन्होंने खुद पहले जनता को रखा और जनता के उत्थान के लिए कार्य किया।
क्या कारण है कि हम राजा या लीडर को सबकुछ मान लेते हैं?
हमारे अंदर शुरू से ही अपने लीडर को अपना सब कुछ मानने की प्रवृत्ति रही है। हमने कभी भी अपने लीडर के खिलाफ जल्दी बगावत नहीं किया भले वो कितना भी खराब काम करे या हमारे खिलाफ रहे।
कुछ महत्वपूर्ण बात ये भी है कि हम जागने में बहुत देर करते हैं, जैसे मान लीजिए कि हमें पता है कि जिस लीडर को हमने चुना है वो अपनी जगह पर है और हमे आदत है कि जब तक हमारा पे भरता रहेगा हम अपने लीडर पर उंगली नहीं उठाएंगे, भले ही हमे पता हो कि वो लीडर धीरे धीरे सब खोखला कर रहा है, पर हम इंतजार करते है दूसरा कोई विरोध शुरू करे तब हम हमारा मन होगा तो हम भी सहयोग करेंगे। पर लीडर को पता है कि अगर कुछ उसके खिलाफ हो भी जाएंगे तब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो उसे भगवान का दर्जा दे रखे हैं और वो उसके खिलाफ जल्दी नहीं होंगे।
हमें पता है कि हमने अपना लीडर अपने उत्थान के लिए चुना है फिर भी हम उसको भगवान मानकर उसको सर- आंखों पर रखते हैं।
सच बात ये है कि हम शुरू से ही इंतजार में रहते हैं कि कोई आयेगा जो हमे मुसीबत से बाहर निकलेगा। पर हम ये भूल जाते हैं कि वो कोई हम भी तो हो सकते हैं।
हम खराब लीडर के खिलाफ कब होते हैं?
ऐसा नहीं है कि हम उसे हरदम सर आंखों पर चढ़ा कर रखते हैं, हमारा भी जमीर जगता है और हम उसे उखाड़ फेंकने की ताकत रखते हैं। लेकिन हम तब – तक नहीं जागते जब – तक हमें न लगे कि हमार सब कुछ तबाह हो गया है।
यही कारण रहा कि विदेशी ताकतों ने हमारे ऊपर राज किया और उनका विरोध करने में हमने सैकड़ों साल लगा दिए।
हर बार यही हुआ हर बार हमारे ऊपर कोई राज करने आया और हर बार हमने उसका विध करने में काफी समय लगाया।
ऐसा नहीं है कि अच्छे लीडर ने सत्ता नहीं संभाली, पर बुरे लीडर को पहचानने में हमने काफी समय व्यर्थ किया। वर्तमान में भी जो हम लीडर चुनते हैं उसको पता रहता है कि जनता उसका विरोध करने में बहुत समय लेगी, पर उसको ये भी पता होता है कि जब तक जनता उसको भगवान का दर्जा देगी तब तक उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। और उसको ये भी पता है कि प्राचीन समय से चली आ रही वर्गीकरण ही उसकी सत्ता में बने रहने का मूल मंत्र है।
महान व्यक्तियों ने लीडरशिप पर क्या कहा है ?
1. डॉ. बी.आर. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
”धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है, लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा (Hero-worship) पतन और अंततः तानाशाही का सबसे निश्चित मार्ग है।”
2. गौतम बुद्ध (Gautam Buddha)
”अपना दीपक स्वयं बनो (अप्प दीपो भव)। अपने उद्धार के लिए किसी और पर निर्भर मत रहो।”
3. भगत सिंह (Bhagat Singh)
”निर्मम आलोचना और स्वतंत्र विचार, ये दोनों क्रांतिकारी और प्रगतिशील सोच के अनिवार्य लक्षण हैं।”
4. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)
”सच्चा लोकतंत्र वह नहीं है जो कुछ लोगों के द्वारा चलाया जाए, बल्कि वह है जिसमें हर छोटे से छोटे व्यक्ति की भागीदारी हो।”
5. अब्राहम लिंकन (Abraham Lincoln)
”कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं है कि वह दूसरे व्यक्ति की सहमति और उसकी भलाई के बिना उस पर शासन कर सके।”
6. स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)
”नेतृत्व का मतलब हुक्म चलाना नहीं है, बल्कि दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए खुद को समर्पित कर देना है।”
7. नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela)
”एक अच्छा नेता वह है जो लोगों को यह महसूस कराए कि वे ही वास्तविक नेता हैं।”
8. प्लेटो (Plato)
”राजनीति और समाज के मामलों में अंधी निष्ठा रखने वालों को हमेशा अयोग्य और स्वार्थी लोगों द्वारा शासित होने का दंड भुगतना पड़ता है।
निष्कर्ष
जब तक हम ये नहीं समझेंगे कि हमने जिसे अपना लीडर चुना है वो हमारे लिए ही चुना गया है। हमारी शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, रोजगार, सड़क, पानी, भोजन, आदि उसकी जिम्मेदारी है कि वो किस तरह इन जरूरतों को हम तक पहुंचाए। अगर वो ये सब करने में असमर्थ है तो उसे हमारा लीडर बनने की भी काबिलियत नहीं है, उसे उसके पद से हटा देना ही बेहतर होता है।
