भारत में प्राचीन समय से ही लीडरशिप रहा है, यानी हमने अपना लीडर या नेता हरदम से चुना है।
पर बात लीडर चुनने की नहीं है, बात ये हो जाती है कि हम अपने लीडर को अपना कर्ता धर्ता या अपना भगवान मान लेते हैं। हम इतने ज्यादा उस व्यक्ति पर आश्रित/डिपेंड हो जाते हैं कि उसकी हर बात और कार्य पर बिना कुछ सोचे समझे अंधा विश्वास करने लगते हैं और उसे अपना भगवान बना लेते हैं।