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एक रिक्शा चालक के बेटे का IAS बनने तक का सफर: गोविंद जायसवाल की सच्ची कहानी

प्रस्तावना जब आप एक ऐसे घर में पैदा होते हैं जहां पिता को 10 रुपये कमाने के लिए दिन भर रिक्शे का पैडल मारना पड़े, तो ‘सपना’ देखना भी एक विलासिता (Luxury…

प्रस्तावना

जब आप एक ऐसे घर में पैदा होते हैं जहां पिता को 10 रुपये कमाने के लिए दिन भर रिक्शे का पैडल मारना पड़े, तो ‘सपना’ देखना भी एक विलासिता (Luxury) लगता है। लेकिन वाराणसी के रहने वाले गोविंद जायसवाल ने न सिर्फ सपना देखा, बल्कि अपने आंसुओं और अपमान को सीढ़ी बनाकर देश की सबसे कठिन परीक्षा UPSC को पहली ही बार में पास कर लिया। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि एक असली जिंदगी का सच है।
वह अपमान, जिसने बदल दी जिंदगी
गोविंद के पिता नारायण जायसवाल वाराणसी की सड़कों पर रिक्शा चलाते थे। परिवार में तीन बहनें और एक भाई (गोविंद) थे। घर की हालत इतनी खराब थी कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती थी।
गोविंद जब 11 साल के थे, तो उनके साथ एक ऐसी घटना घटी जिसने उनके बालमन पर गहरा असर डाला। वह अपने एक अमीर दोस्त के घर खेलने गए थे। दोस्त के पिता ने गोविंद को वहां देखा और यह कहकर उसे घर से धक्के मारकर निकाल दिया— “तू एक रिक्शेवाले का बेटा है, तेरी औकात नहीं है मेरे बेटे के साथ खेलने की। जा यहां से!” गोविंद रोते हुए घर लौटे। उस दिन उस 11 साल के बच्चे ने तय कर लिया कि वह अपनी ‘औकात’ इतना बड़ा करेगा कि ऐसे लोगों को सिर झुकाना पड़े। उन्होंने पूछा कि दुनिया की सबसे बड़ी नौकरी कौन सी होती है, जवाब मिला— IAS. बस, मंजिल तय हो गई।

पिता का बलिदान: घाव से बहता खून और रिक्शे का पैडल

गोविंद को दिल्ली जाकर UPSC की तैयारी करनी थी, जिसके लिए पैसों की जरूरत थी। उनके पिता नारायण जायसवाल ने अपने बेटे के सपने के लिए अपनी पुश्तैनी थोड़ी सी जमीन बेच दी। लेकिन वह पैसा काफी नहीं था।
पिता के पैरों में घाव था, उन्हें ठीक से सुनाई भी नहीं देता था, लेकिन फिर भी वह दिन-रात रिक्शा चलाते रहे। कई बार उनके घाव से खून रिसता था, लेकिन वह रुकते नहीं थे क्योंकि उन्हें अपने बेटे को दिल्ली में भूखा नहीं सोने देना था। गोविंद जानते थे कि उनके पास भेजा जाने वाला हर रुपया उनके पिता के खून और पसीने से सना है।

दिल्ली का वह घुटन भरा कमरा और भूख

गोविंद दिल्ली के मुखर्जी नगर के पास एक छोटे से सीलन भरे कमरे में रहने लगे। उस कमरे में न खिड़की थी और न ठीक से हवा आती थी। पैसे बचाने के लिए गोविंद दिन में सिर्फ एक बार खाना खाते थे और कभी-कभी तो चाय पीकर ही दिन गुजार लेते थे।
वह दिन में 14-14 घंटे पढ़ाई करते थे। जब भी नींद आती या थकान होती, तो उन्हें अपने पिता का वह रिक्शा और वह अपमान याद आ जाता, जो उन्हें फिर से किताबें उठाने पर मजबूर कर देता।

परिणाम का दिन: 2006 UPSC Result

2006 में UPSC का फाइनल रिजल्ट आया। गोविंद जायसवाल ने अपने पहले ही प्रयास में All India Rank 48 हासिल कर ली थी।
जब यह खबर वाराणसी पहुंची, तो पूरे शहर में हलचल मच गई। जिस रिक्शेवाले को कल तक लोग हिकारत की नजर से देखते थे, आज उसके घर के बाहर मीडिया और बड़े-बड़े नेताओं की लाइन लगी थी। नारायण जायसवाल की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उनके बेटे ने न सिर्फ IAS की कुर्सी हासिल की थी, बल्कि अपने पिता के हर अपमान का हिसाब सूद समेत वापस कर दिया था।

निष्कर्ष

गोविंद जायसवाल सर की यह सच्ची कहानी (IAS 2006 Batch) हमें यह सिखाती है कि गरीबी आपका रास्ता जरूर मुश्किल कर सकती है, लेकिन वह आपको आपकी मंजिल तक पहुंचने से रोक नहीं सकती। अगर सीने में अपमान की आग और कुछ कर गुजरने का जुनून हो, तो रिक्शेवाले का बेटा भी देश का सबसे बड़ा अधिकारी बन सकता है।
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