Madame Curie Birthday: मानवतावाद के लिए भी जानी जाती हैं मैडम क्यूरी


दुनिया के महान वैज्ञानिकों में मैडम क्यूरी (Madame Curie) को बहुत ही ज्यादा सम्मान की निगाह से देखा जाता है. उन्होंने विज्ञान के लिए अपने जीवन तक की परवाह नहीं की और रेडियोधर्मिता (Radioactivity) की खोज बाद उसके खतरनाक रूप होने के बाद उस पर प्रयोग करती रहीं और अपने जीवन की परवाह ना करते हुए  वे दुनिया के एकमात्र महिला हैं जिन्हें दो बार नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से सम्मानित किया गया था. लेकिन उन्हें एक बेहतरीन व्यक्तित्व और मानवता के सेवा के लिए ज्यादा जाना जाता है. दुनिया 7 नवंबर को उनके जन्मदिन पर उन्हें याद कर रही है. उनकी रेडियोधर्मीता संबंधी खोजें आधुनिक विज्ञान का आधार मानी जाती हैं.

पिता ने दी पढाई में रुचि की प्रेरणा
मैरी पोलैंड के वर्सा में माता पिता के घर पैदा हुईं थी जो उस समय रूस का हिस्सा था. बचपन में उनका नाम मारिया स्क्लोदोवास्का था. माता पिता दोनों के ही शिक्षक होने के कारण बचपन से ही उन्हें पढ़ाई का माहौल और रुचि दोनों ही मिले. 10 साल की उम्र में ही उनकी मां का टीबी की बीमारी की वजह से देहांत हो गया. उनके पिता विज्ञान के शिक्षक थे. उन्होंने अपनी बेटी की जिज्ञासा को पनपने में मदद की.

काम का जनून
मैडम क्यूरी ने ताउम्र लैब में ही काम करना पसंद किया था और वे अपना अधिकांश समय लैब में ही गुजारती थीं. यही वजह थी कि उनका जीवन भी पढ़ाई के इर्दगिर्द ही गुजरा. उन्होंने शुरुआती दिनों में गवर्नेस का काम भी किया और पढ़ाई की रुचि के चलते ट्यूशन भी पढ़ाई. पढ़ाई के दौरान और उसके बाद भी उन्हें जीवन में आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा. पेरिस में उनके पास इतने कम कपड़े  होते थे कि ठंड से बचने के लिए सर्दियों में उन्हें अपने सारे कपड़े पहनने पड़ते. फिर भी उनका सबसे ज्यादा खर्च प्रयोगों पर होता था.

लैब में दोस्ती फिर शादी
जब वे आगे की पढ़ाई करने पेरिस गईं तो वहां उनकी पियरे क्यूरी से उनकी मुलाकात हुई और उनकी लैब में काम करने के दौरान उनकी दोस्ती गहराई. पहले तो स्क्लोदोवास्का ने पियरे का प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकि वे वापस पोलैंड जाना चाहती थी, लेकिन पोलैंड में उन्हें काम करने का मौका नहीं मिला. फिर पियरे ने उन्हें खत लिखकर पेरिस लौटकर पीएचडी करने की सलाह दी जिसे स्क्लोदोवास्का ने मान लिया और अंततः 1895 में दोनों ने शादी कर ली. पति के साथ मिलकर उन्होंने रेडियो एक्टिविटी की खोज की यह नाम भी उन्होंने ही दिया.

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मैडम क्यूरी (Madame Curie) ने अपने पति की मौत के बाद उनके काम को भी आगे बढ़ाया था. (फाइल फोटो)

पति की मौत के सदमे को बदला काम के जुनून में
क्यूरी दम्पत्ति को 1903 में रेडियो एक्टिविट की  खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके एक साल बाद पति की दुर्घटना में मृत्यु के बाद मैडम क्यूरी ने अपना मन पूरी तरह  से शोधकार्य में लगा दिया और रेडियम के शुद्धिकरण के लिए 1911 में एक बार फिर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला. इसके साथ ही वो दो बार नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाली पहली महिला बन गईं.

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नोबेल पुरस्कार के रिकॉर्ड
मैडम क्यूरी के नाम नोबेल पुरस्कार को लेकर ही  कई अनोखे रिकॉर्ड हैं जो आज तक नहीं टूटे हैं. वे नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला थीं. आज भी वे ही एकमात्र महिला हैं जिसने दो नोबेल पुरस्कार जीते हैं और दो अलग क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीते हैं. साल 1955 में उनकी बेटी आइरीन ने भी नोबेल पुरस्कार जीता है. इस तरह वे इकलौती ऐसी महिला हैं जिनकी संतान ने नोबेल पुरस्कार जीता है. यह बात भी ज्यादा लोग नहीं जानते हैं कि मैडन क्यूरी ने पहला नोबोल अपने पति के साथ जीता था.

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मैडम क्यूरी (Madame Curie) का मानना था कि वैज्ञानिकों को पुरस्कार में मिलने वाली राशि का कुछ हिस्सा उनके संस्थानों को भी मिलना चाहिए. (फाइल फोटो)

दो विशेष खोज
मैडम क्यूरी ने दो नए तत्वों पोलोनियम और रेडियम की खोज की. 2011 में रेडियम के शुद्धिकरण पर नोबेल पुरस्कार पाने के बाद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने एक्स रे रेडियोग्राफी के विकास में अपना समय लगा दिया. इसके बाद उन्होंने अपना बहुत सारा समय रेडियोएक्टिविटी के चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग को समर्पित कर दिया.

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4 जुलाई 1934 को उनकी मौत रेडिएशन के कारण अप्लास्टिक एनिमिया से हुई थी. वे नाभकीय भौतिकी और रसायन शास्त्र में अतुलनीय योगदान के लिए जानी जाती हैं  उनकी रेडियो एक्टिविटी के खोज के बाद ही रेदरफोर्ड उसका उपयोग कर परमाणु की संरचरना की खोज कर सकते और परमाणु भौतिकी का नया आयाम खुल सका. मैडम क्यूरी का कहना था कि उन्हें जो पुरस्कार और सम्मान दिए जा रहे हैं उसे उन संस्थानों के दिए जाएं जिनमें वे काम कर रही थीं.

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