NEET परीक्षा में दिव्यांगों से लिए परीक्षकों को जागरूक करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट 


NEET परीक्षा में दिव्यांगों से लिए परीक्षकों को जागरूक करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट 

NEET परीक्षा में दिव्यांगों से लिए परीक्षकों को जागरूक करना जरूरी.

नई दिल्ली:

NEET परीक्षा मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) हर छात्र के प्रति जवाबदेह है, NTA कानून के शासन से शासित है. कोर्ट ने कहा कि भविष्य में दिव्यांगों के लिए सुविधाओं के लिए परीक्षकों को जागरूक किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने NEET परीक्षा में अतिरिक्त समय ना मिलने वाली दिव्यांग छात्रा के लिए दो हफ्ते के भीतर समाधान खोजने का आदेश भी दिया है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि छात्रा के लिए दोबारा परीक्षा नहीं होगी. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने फैसला सुनाते हुए कहा, “भविष्य में सभी परीक्षकों को जागरूक किया जाना चाहिए और दिव्यांग छात्रों के लिए सुविधाओं के बारे में नियमित रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.”

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उन्होंने कहा, “NEET के लिए 16 लाख छात्र उपस्थित होते हैं, जिनकी जिंदगी अनजाने में की गई बड़ी गलतियों के कारण बदल सकती है. दिव्यांग छात्रा को समय में छूट देने से गलत तरीके से इनकार किया गया और उसे एक अतिरिक्त घंटे से वंचित कर दिया गया. इस न्यायालय द्वारा उपाय की कमी छात्रा के जीवन के लिए अपूरणीय अन्याय का कारण बन सकती है.”

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने NEET के लिए उपस्थित होने वाले दिव्यांग छात्रों के लिए विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता पर जोर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि परीक्षा के पर्यवेक्षकों को दिव्यांग छात्रों से निपटने के लिए उचित रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. एक दिव्यांग छात्रा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां की जिसने पुन: परीक्षा/अनुग्रह अंक देने की मांग की है. 

दरअसल छात्रा को डिस्ग्राफिया (एक सीखने की अक्षमता जो लिखने की क्षमता में कमी की ओर ले जाती है) है. छात्रा ने आरोप लगाया कि उसे नीट की परीक्षा पूरी करने के लिए एक घंटे का अतिरिक्त समय नहीं दिया गया, पेपर छीन लिया गया. सुनवाई के दौरान जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने केंद्र से कहा था कि NEET  के लिए ब्रोशर में दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए विशिष्ट सुविधा होनी चाहिए और पर्यवेक्षकों के लिए उचित प्रशिक्षण की भी आवश्यकता है . आपको नीति के मामले के रूप में फैसला करना होगा, आपको सोचना चाहिए कि इसे सही करने के लिए क्या करना चाहिए. आज चिकित्सा क्षेत्र में इतनी प्रतिस्पर्धी है.

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पीठ ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी से इस पर विचार करने और जवाब देने के लिए कहा कि क्या दिव्यांग कोटे के तहत खाली सीटों के बीच छात्रा को समायोजित किया जा सकता है. यह मामला जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ के समक्ष आया है. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के वकील रूपेश कुमार ने कहा कि  इस समय हमारे लिए यह मुश्किल होगा क्योंकि वहां 16 लाख छात्र थे, इस स्तर पर वह कुछ अन्य छात्रों का स्थान ले सकती है और यह दूसरों के लिए कठोर होगा. 

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील ने दलील दी कि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी के लिए 16 लाख छात्र हैं, लेकिन मेरे लिए यह केवल एक परीक्षा है. कलम के एक झटके से मेरा करियर बदल सकता है. इस पर पीठ ने कहा ईश्वर आपके मुवक्किल को आशीर्वाद दें और आपको प्रवेश मिल जाए, लेकिन हमें उम्मीद है कि भविष्य में ये गलतियां दोहराई नहीं जाएंगी.  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को शुक्रवार तक लिखित जवाब मांगा था.

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