Ground Report: तंबू में रहने को मजबूर जेवर एयरपोर्ट के लिए जमीन देने वाले किसान, बयां की दर्दभरी दास्तां


इस बीच प्रधानमंत्री के कार्यक्रम से ठीक 700 मिटर दूर रोही गांव में 45 साल के ओमपाल पिछले तीन साल से पॉलीथीन के तंबू में रह रहे हैं. न ओमपाल को अब तक मुआवज़ा मिला है और न भूमि अधिग्रहण कानून के तहत रहने के लिए प्लॉट दिया गया है. ओमपाल ने बताया कि मैं तीन साल से इसी तंबू में रह रहा हूं. सारे कागज पूरे हैं, लेकिन न तो अब तक मुआवजा मिला है और न ही प्लॉट, तो कहां जाऊं. मजबूरी में यहीं रह रहा हूं. जानवर भी यहीं हैं, अधिकारी आजकल कर रहे हैं.

बता दें कि रोही गांव से सभी घरों को एयरपोर्ट के भूमि अधिग्रहण के बाद ढहा दिया गया था. लेकिन अब तक 100 किसान परिवार ऐसे हैं, जिन्हें या तो मुआवजा नहीं मिला. अगर मुआवज़ा मिला भी है तो कानून के मुताबिक़ शहर में रहने के लिए प्लॉट नहीं मिला. 82 साल के रामस्वरूप भी 1000 गज़ अपने पक्के घर को ढहा दिए जाने के बाद मजबूरी में अपनी पत्नी के साथ तंबू बनाकर रहने को मजबूर हैं. रामस्वरूप ने बताया कि हमें सही मुआवज़ा नहीं मिल रहा था. हमारा हज़ार गज का घर था, जिसे गिरा दिया गया. हमें 100 गज का प्लॉट दे रहे हैं, हम उसमें कैसे रहेंगे. ट्रैक्टर कहां खड़ा करेंगे, भैंस कहां बांधेंगे. हमने हाईकोर्ट में मुकदमा दर्ज किया है कि हमें सही मुआवज़ा मिले.

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रोही गांव से निकलकर एनडीटीवी की टीम एयरपोर्ट के लिए अधिग्रहीत किए गए नंगला शरीफ गांव पहुंचे. वहां 45 साल के हसन मोहम्मद मिले. हसन मोहम्मद का घर भी तीन साल पहले एयरपोर्ट बनाने के लिए ढहा दिया गया था. तब से हसन अपने 4 बच्चों के साथ तंबू में रहने के लिए मजबूर हैं. हसन को मुआवज़ा तो मिल गया पर रहने के लिए प्लॉट नहीं मिला, इसलिए मजबूरी में छोटे बच्चों के साथ 6/6 के तंबू में इस साल भी ठंड काटने के लिए मजबूर  हैं. हसन मोहम्मद ने बताया कि हमें मुआवजा मिला पर प्लॉट नहीं मिला. हम लोग कहां जाएं. तो यहीं मजबूरी में रह रहे हैं. कागज़ पूरे हैं पर अधिकारी कहते हैं आज मिलेगा कल मिलेगा. 

नंगला शरीफ गांव के करीब 15 किसान परिवार हैं, जो ऐसे तंबू में रहने पर मजबूर हैं. यहां बिजली काट दी गई है और पानी का इंतजाम भी नहीं है. निवासी कौसर ने बताया कि रात में अंधेरे में रहते हैं. न बिजली है और पानी भी नहीं है. रात में मच्छर काटते हैं. अब तक पैसा भी नहीं मिला.

जानवरों को कहां रखें?

उधर, जिन लोगों को 100 गज का प्लॉट मिल गया है, वो यहां अपने जानवरों के लिए रहने पर मजबूर हैं. क्योंकि ये 100 गज के प्लॉट में खुद रहें या अपनी गाय-भैसों को रखें. नंगला शरीफ गांव के निवासी निजामुद्दीन कहा कहना है कि हमें प्लाट तो मिला है पर 100 गज में खुद रहें, बच्चों को रखें या फिर भैंसे बांधें. जगह ही नहीं है. अधिकारी कहते हैं कि आप यहां भैंस नहीं पाल सकते, हम तो अपना जीवन भैसों से चलाते हैं.

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हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया

खेड़ा दयानतपुर के रहने वाले 62 साल के अजय प्रताप सिंह लगभग 500 किसानों के साथ मिलकर एयरपोर्ट के लिए हुए भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गए हैं. अजय प्रताप का आरोप है कि सरकार ने किसानों को 4 गुना मुआवज़ा देने की बजाय दोगुना मुआवज़ा ही दिया है. पहले इन गांव को शहरी क्षेत्र दिखाया, फिर तकनीकी खामी बताकर आबादी को ग्रामीण घोषित कर दिया. नियम के मुताबिक़ अगर जमीन शहरी है तो मुआवज़ा सर्किल रेट का दो गुना मिलता है और ग्रामीण क्षेत्र में मुआवज़ा चार गुना देना पड़ता है.

विधायक बोले, अधिग्रहण में हुई जल्दबाजी

वहीं जेवर से बीजेपी के विधायक धीरेंद्र सिंह मानते हैं कि अधिग्रहण में जल्दीबाजी हुई है. जिस वजह से किसानों को सही मुआवजा और निवास नहीं मिल पाया है. कोरोना काल की वजह से प्रोजेक्ट लेट हुआ था, लेकिन हम किसानों को सही से मुआवजा दिलवाएंगे. 

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